हिरोशिमा परमाणु हमले पर कविता | poem on hiroshima atomic war in hindi

       
         हिरोशिमा कविता

उस दिन दुनिया मे मौसम आदमखोर हुआ
जिस दिन हिरोशिमा मे परमाणु विस्फोट हुआ
सुरज सबसे पहले किरणे जिस धरती को देता है
बोद्ध धर्म की उस नगरी मे भीषण नरसंहार हुआ ।।"


"6 अगस्त को अमेरिका अपनी औकात दिखा बैठा
बेकसुरो पर हमला करके अपनी जात दिखा बैठा
0.7 ग्राम यूरेनियम का यह परिणाम हुआ देखो
पल भर मे ही लाखो लोगो का नरसंहार हुआ ।।"

अमेरिका ने ना सोचा समझा दुष्परिणामो को
अधिकारो के अंधेपन ने मानवता को झकझोर दिया
हिरोशिमा अगणित बलिदानो की धरती है
द्वितीय विश्व युद्ध के दुष्परिणामो की अभिव्यक्ति है

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हिरोशिमा है जहां रूदन है बच्चो की किलकारी मे
जहाँ बच्चे जन्म से सहमे सहमे दिखते है 
विकलांगता के दंश को जीवन भर सहते है
हिरोशिमा है जहाँ की धरती बंजर बर्बाद हुई
हिरोशिमा है जहाँ प्रकृति का विध्वंस हुआ 
हिरोशिमा है जहाँ अब पेड़ - पौधे नही उगते है 
हिरोशिमा है जहाँ पानी विषदूषीत सी रहता है
रेडियोएक्टिव किरणों से जनजीवन बर्बाद हुआ
हिरोशिमा है जहाँ सभ्यता का विध्वंस हुआ
हिरोशिमा है जहाँ गर्मी से पानी सुख गया 
हिरोशिमा है जहाँ जीवो का सर्वनाश हुआ
हिरोशिमा है जहाँ उगता सुरज भी फीका है 
हिरोशिमा है जहाँ मानवता का सिर झुक जाता है

दिल दहला देती है करतूते अमेरिका की
आँखो मे आँसू लाती है हालत मरने वालो की
कुछ वधूओं की कुमकुम बिन्दी वापस लौट नही पायी
कुछ बहनो की राखी जल गयी होगी विस्फोटो मे
कुछ माताओं ने अपने पुत्रों को खोया होगा
कुछ पिताओं ने अपने बच्चो का बलिदान दिया
कुछ बच्चो ने तो अपनी दुनिया ही खोयी होगी
माता-पिता को खोकर , अनाथ अभिशाप लिया होगा
काव्य नही , मेरी यह श्रद्धा सुमन अभिव्यक्ति है
हिरोशिमा बलिदानो को आत्मशान्ति अभिव्यक्ति है
क्या रूस को डराने का यह तरीका बहुत जरूरी था 
लाखों निर्दोषों का हत्यारा बनना बहुत जरूरी था 
महत्वकांक्षओ और वर्चस्वों के इनके युद्धो मे 
क्या बेकसूर लोगो का मारा जाना बहुत जरूरी था 

सिर्फ पल दो पल की चर्चा कर दी इस दुर्घटना पर
इतना घमंड में होना भी अच्छी बात नहीं
कि एक माफी भी ना मांग सको तुम इस दुर्घटना पर


मै कलम सिपाही चारण और क्या कह सकता हूँ
शब्द - सुमन श्रद्धा के अर्पित करता हूँ
काव्य नही , मेरी यह श्रद्धा सुमन अभिव्यक्ति है
हिरोशिमा बलिदानो का आत्मशान्ति अभिव्यक्ति है...

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           ओम सिंह चारण ' देवीपुत्र'


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