आखिर महाभारत का युद्ध क्यों हुआ था? 5 Reason Of Mahabharat Yuddh

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महाभारत का युद्ध history का सबसे विनाशक युद्ध माना जाता है.. यह युद्ध 18 दिनों तक चला और इसमें असंख्य सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गये... वैसे ये युद्ध एक परिवार का था लेकिन इसमें पुरे भारत वर्ष के राजाओं ने इसमें भाग लिया था...


mahabharat yuddh


महाभारत काल में हस्तिनापुर बहुत शक्तिशाली राज्य था और इसी राज्य के कौरवों और पांडवो के आपसी झगड़े में कितने ही लोगो की लाशें बिछा दी गई.. इस युद्ध की शुरुआत कोई एकाएक नहीं हुई थी... इसके पीछे कितने ही वर्षो की चलती आ रही भाईओ की लड़ाई का परिणाम था..

इस युद्ध के होने के कई कारण थे.. बहुत सी ऐसी घटनाएँ हुई जो की इस युद्ध का कारण बनी थी... कौरवों का बड़ा भाई दुर्योधन था और पांडवों का बड़ा भाई युधिष्ठिर था... इन दोनों में से युधिष्ठिर बड़े थे और धर्म के ज्ञाता भी थे इस कारण हस्तिनापुर के युवराज बनने के लिए वो ही उपयुक्त थे... लेकिन दुर्योधन के पिता उस समय पांडू की मृत्यु के बाद राजा बन गये थे, तो दुर्योधन अपने पिता का बड़ा पुत्र होने के नाते युवराज बनने की चेष्टा रखता था...

दुर्योधन की इसी चेष्टा का परिणाम महाभारत निकला.. महाभारत के युद्ध के पीछे ये मुख्य कारण था लेकिन इस कारण के साथ साथ 5 मुख्य कारण और भी थे जिसके कारण महाभारत का युद्ध हुआ...

कुछ लोग मानते है की लाक्षागृह  , द्युत , हस्तिनापुर का विभाजन आदि महाभारत युद्ध के कारण थे लेकिन ऐसा माना उचित नहीं है क्योंकि यह सब तो साइड की घटनाएँ थी कोई प्रमुख कारण नहीं थे..
आज हम उन 5 कारणों की बात करेंगे जो की महाभारत युद्ध के प्रमुख कारण थे.. जिनके कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ ... इसलिए आप इस पोस्ट को last तक जरुर पढ़े जिससे आप पूरी post को ठीक से समझ सके...

महाभारत युद्ध के 5 बड़े कारण

Table Of Content


महाभारत युद्ध के कारण क्या  थे ?

  1.      धृतराष्ट का पुत्र मोह
  2.      दुर्योधन की महत्वकांक्षा
  3.      भीष्म और द्रोण का मौन
  4.      कर्ण का साथ
  5.      कृष्ण के प्रस्ताव को न मानना



1.  धृतराष्ट् का पुत्र मोह


   वैसे तो हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बड़ा पुत्र होने के नाते धृतराष्ट् था लेकिन वो जन्म से अंधे थे..इस कारण जब भीष्म उन्हें राजा बनाना चाहते तब विदुर ने इसे निति के विरुद्ध बताकर पांडू को राजा बनाने का परामर्श दिया... इस कारण पांडु हस्तिनापुर के राजा बन गये ... और उस दिन से ही धृतराष्ट् के मन में कुंठा घर कर गई.. जब दुर्योधन का जन्म हुआ तो वो उसे भावी राजा के रूप में देखने  लगा... उन्हें अपने पुत्र से बहुत लगाव था वे येनकेन प्रकारेण दुर्योधन को राजा बनाना चाहते थे... इसलिए वे दुर्योधन की हर अनुचित मांगो को भी मान लेते थे...

धृतराष्ट् पुत्र मोह में इतने अंधे हो गये थे की उन्हें अपने पुत्र की बड़ी बड़ी गलतियाँ भी सही लगती थी... वे आँखों से अंधे थे तब तक तो कई ज्यादा नुकसान नहीं था परन्तु पुत्र मोह में अंधे होकर उन्होंने महाभारत के युद्ध को न्योता दे दिया..

पांडवों के वारणावत जाने का प्रस्ताव दुर्योधन लाया था और विदुर इसके विरुद्ध में था फिर भी वो पुत्र मोह में मना नहीं कर पाए और दुर्योधन के कुकर्म में अप्रत्यक्ष रूप से साथ दिया.. द्युत का निमन्त्रण भी धृतराष्ट् ने ही दिया था और वो जानता था की शकुनी कुटिल चाले चलेगा फिर भी पुत्र मोह में वे चुप रहे... द्रोपदी वस्त्रहरण के समय भी राजा होकर भी चुप रहे क्योंकि यह उसके प्रिय पुत्र की इच्छा के अनुसार हो रहा था..

droupdi
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इस प्रकार उन्होंने अपने पुत्र मोह में दुर्योधन की हर अनुचित गतिविधि में अप्रत्यक्ष रूप से साथ दिया जो की महाभारत युद्ध का कारण बना.. धृतराष्ट् पांडवों के ज्येष्ठ पिताश्री थे इस लिहाज से भी पांडवों का ख्याल रखना चाहिए परन्तु उन्होंने राज्य के विभाजन के समय भी अपने पुत्र मोह में हस्तिनापुर दुर्योधन को दे दिया और उजड़ा इलाका पांडवो को दे दिया...



2.  दुर्योधन की महत्वकांक्षा और शकुनी का साथ


    कौरवों में दुर्योधन सबसे बडा  था.. बचपन से ही उसे मामा शकुनी का साथ मिला .. इस कारण बचपन से ही दुर्योधन के मन में महत्वकांक्षा घर कर गई.. शकुनी ने इस आग को लगाने और उसमे निरंतर घी डालने का काम किया... शकुनी गांधारी का भाई था और दुर्योधन का मामा लगता था... शकुनी अपनी बहिन का विवाह एक अंधे व्यक्ति के साथ हो जाने से नाराज था और इसका बदला वो हस्तिनापुर से लेना चाहता था....

इस कारण उसने दुर्योधन की महत्वकांक्षा को बढ़ाने का काम किया... वो बचपन से ही दुर्योधन को पांडवों के खिलाफ भडकाने लगा था जिससे दुर्योधन के मन में पांडवों से नफरत हो गई थी... शकुनी ने ही लाक्षागृह  , द्युत आदि कुटिल चले चली थी.. वो तो हमेशा से ही पांडवो और कौरवों का विनाश चाहता था.. इसलिए उसने ही महाभारत युद्ध की नीव में पत्थर रखने कला काम किया...

दुर्योधन अपनी महत्वकांक्षा के कारण उचित-अनुचित का पता करने में नाकाम रहा.. वो सब कुछ पाना चाहता था.. जब राज्य का बंटवारा हुआ तब भी वो यह सोचता था की आधा राज्य उसके हाथो से निकल गया लेकिन वास्तविकता तो यह थी की आधा राज्य उसे मिला था...

इस कारण उसने उस आधे राज्यं को पाने के लिए द्युत का आयोजन किया और उसमें सारी मर्यादाओं को ताक में रखते हुए अपनी असभ्यता का परिचय दिया और पांडवो को कभी न भरने वाला घाव दे दियब .. जिससे भरने के लिए या यूँ कहे की अपने इस अपमान के बदले के लिए पांडव 13 वर्ष तक तपते रहे और दुर्योधन की इस महत्वकांक्षा ने महाभारत युद्ध के द्वार को खोल दिया...


महाभारत का युद्ध क्यों हुआ?

3. भीष्म और द्रोणाचार्य का मौन रहना


    भीष्म व द्रोणाचार्य महाभारत में दो अद्भुत योद्धा थे..दोनों के पास शक्ति , ज्ञान की कोई कमी नहीं थी.. भीष्म तो अजेय थे और इस कारण हस्तिनापुर एक शक्तिशाली राष्ट्र बन चूका था..

लेकिन इन दोनों को उचित समय पर मौन रहना हस्तिनापुर के लिए घातक साबित हुआ और परिणाम के रूप में भयानक युद्ध सामने आया..  जब द्रौपदी वस्त्रहरण हो रहा था तब भी यह दोनों वहां पर थे लेकिन चुप थे... यही चुपी भारत वर्ष को महंगी पड गई... यदि उस समय ये दोनों बोले होते तो मजाल किसीकी जो उनके सामने बोलने की हिम्मत करते परन्तु हस्तिनापुर सिंहासन से बंधे रहने की प्रतिज्ञा करने वाले भीष्म और गुरु द्रोण मौन ही रहे...

दोनों का मौन रहने का कारण था की वे हस्तिनापुर से बंधे थे और जो हस्तिनापुर का नरेश आदेश देते उसका पालन करना यह अपना धर्म मानते थे... और ये बात दुर्योधन भी जानता था की ये दोनों उसे छोडकर जाने वाले नहीं है यदि युद्ध हुआ तो ये उसके ही पक्ष में युद्ध लड़ेंगे जिससे उसकी विजय तो आसानी से हो जाएगी ...

इस कारण उनको अपने पक्ष में पाकर दुर्योधन युद्ध को उतारू था की जब ये दोनों उसके साथ है तो भला किस बात की चिंता... भीष्म और द्रोण उस वक्त मौन न रहकर कुछ बोले होते और दुर्योधन का विरोध किया होता तो महाभारत का युद्ध कदाचित इतना भयंकर नहीं होता...



 

4. कर्ण का दुर्योधन का मित्र होना


  यूँ तो कर्ण महारथी था .. वो उच्च कोटि का धनुर्धर था.. वो दानवीर भी था.. लेकिन इन सभी गुणों के बावजूद उसने दुर्योधन का साथ  दिया... और उसी के बलबूते दुर्योधन अर्जुन को चुनौती देता था.. दुर्योधन कर्ण को अपना मित्र मानता था लेकिन कर्ण उसे अपना मित्र न मानकर मालिक मानता था .. और उसके हर अनुचित काम में साथ देता था..

यदि कर्ण दुर्योधन को सही सलाह देता और उसे अनुचित कार्य करने से रोकता तो वो वास्तव में मित्रता के धर्म को निभाता लेकिन उसने तो सिर्फ उसकी हाँ में हाँ ही मिलाया और उसे भडकाने का काम किया..

जब भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य अर्जुन की शक्ति को बताकर दुर्योधन को सावधान करते तब तब कर्ण उससे कहता की अर्जुन से वो अकेल निपट लेगा वो अर्जुन को लेकर चिंता न करे .. जिससे दुर्योधन लगातार गलत मार्ग पर जाने लगा..

कर्ण दुर्योधन को अपना मालिक मानता था इस कारण जब जब दुर्योधन ने जो कहा उसने वो किया कभी भी दुर्योधन की बात नहीं काटी जिससे महाभारत का युद्ध हो गया.. यदि कर्ण उसे सावधान करता और अपने व्यक्तिगत दुश्मनी को भुलाकर यदि वो सही सलाह देता तो कुछ और ही होता...

कर्ण ने स्वयम को अर्जुन से अच्छा साबित करने के लिए महाभारत जेसे युद्ध को न्योता दे दिया और अपने मित्र को भी इसके लिए हमेशा उकसाते रहे..



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5. कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकराना


   ऊपर जितने भी कारण लिखे है उसमें से यह सबसे महत्वपूर्ण कारण है क्योंकि यदि इस प्रस्ताव को मान लिया होता तो महाभारत का युद्ध नहीं होता..
जब पांडवों ने 13 वर्ष का वनवास पूर्ण कर लिया तब उन्होंने अपने राज्य को पुन: माँगा परन्तु दुर्योधन ने उसे देने से इंकार कर दिया.. ऐसी स्थिति में युद्ध ही एकमात्र विकल्प बचा था.. तब भगवान इस होने वाले विनाश से देश को बचाने और सब के कल्याण हेतु शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गये...

उन्होंने वहां पर कहा कि ‘पांडवों ने अपने वचन और नियम के अनुसार 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूर्ण कर लिया है.. अत: अब उन्हें उनका राज्य वापिस दे दिया जाए...’ लेकिन दुर्योधन ने राज्य देने से मन कर दिया  और कहा की ‘यदि आपके पास कोई दूसरा प्रस्ताव हो तो बताओं.’

तब भगवान ने पांडवों के लिए सिर्फ पांच गांवों की मांग की और कहा की आप पांच गाँव ही दे दो पांडव इन 5 गाँव से ही संतुष्ट हो जाएँगे....लेकिन दुयोधन ने कहा कि ‘ पांच गाँव क्या? मैं पांडवों को सुई की नोक के बराबर जमीन भी नहीं दूंगा.”

और उसने कृष्ण को बंधी बनाने का प्रयास किया... तब ही निश्चित हो गया की अब तो युद्ध ही होगा..
यदि युद्ध का प्रमुख कारण माने तो इस प्रस्ताव को न मानना ही है.. यदि दुर्योधन पांडवों को पञ्च गाँव दे देता तो शायद युद्ध नहीं होता...

लेकिन जो होना होता है वो तो होकर ही रहता है हम तो सिर्फ प्रयास ही कर सकते है.. और जो हो गया वो तो हो गया अब केवल यही कह सकते है की यदि ऐसा न होता तो यह नहीं होता... लेकिन भगवान कृष्ण ने Geeta में अर्जुन को समझाते हुए कहा है नकी “हमे सिर्फ कर्म पर ध्यान देना चाहिए उससे मिलने वाले फल पर नहीं.”

इसी प्रकार जिसने जैसा कर्म किया उसे वैसा ही फल मिल गया...


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जानिए कैसे महाभारत युद्ध में 5 योद्धाओं का निहत्थे वध किया गया...

Mahabharat yuddh Story in Hindi


hello दोस्तों आज हम इस post में महाभारत के अनसुने किस्से- कहानियों को आपके साथ share करेंगे...
महाभारत भारत के इतिहास का प्राचीन और बड़ा ग्रन्थ है.. महाभारत के युद्ध मे असंख्य लोगो की मौत हुई थी.. इस भयंकर  युद्ध में कई महावीरों ने भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए..

इस युद्ध की जब शुरुआत हुई तब कौरवों के सेनापति गंगापुत्र  पितामह भीष्म  ( बचपन का नाम देवव्रत ) ने कुछ नियम बनाये थे जो की एक धर्म युद्ध के लिए जरुरी थे..उन युद्द के नियमों मेंसे एक यह नियम था की किसी भी निहत्थे योद्धा का वध नहीं किया जाएगा.. परन्तु जैसे - जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया वैसे ही युद्ध के नियमों को तोडा  जाने लगा.. उस में से गंगापुत्र के द्वारा बनाये एक नियम - निहत्थे को मारा नहीं जायेगा को भी तोडा गया..

आज इस पोस्ट में हम उन 5  योद्धाओं के बारे में जानेगे जिनको तब मारा गया जब ये निहत्थे थे अर्थात उस समय उनके पास कोई अस्त्र-शस्त्र न हो..

महाभारत के युद्ध में कुछ ऐसे योद्धा थे जिन्हें मारना बहुत मुश्किल था ... और जब उनके हाथ में धनुष हो तो भीर उन्हें जितना भी मुश्किल था ... इस कारण युद्ध में उन योद्धा को निहत्था करके उनका वध किया गया..

5  योद्धा जिन्हें निहत्थे मारा गया..


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1. निहत्थे पितामह भीष्म  पर अर्जुन ने चलाएँ थे तीर


             गंगापुत्र भीष्म महाभारत के वृद्ध और बहुत ताकतवर योद्धा थे.. उन्हें अपने पिता से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था.. अर्थात उनकी मौत तब ही हो सकती  थी जब वे खुद मौत चाहते हो.. इस कारण उन्हें उनकी इच्छा के बिना  मारना असम्भव था.. और जब तक गंगापुत्र भीष्म जीवित थे तब तक पांडवों की जीत भी सम्भव नहीं थी क्योंकि उनके बारे में कहा जाता था की गंगापुत्र अपराजेय है अर्थात उनकी हार भी न हो सकती थी..


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पांड्वो के लिए यह समस्या थी की अब पितामह को रास्ते से कैसे हटाएँ/? तब कृष्ण भगवान ने बताया की जब तक गंगापुत्र के हाथ में धनुष है तब तक उन्हें न हो हराया जा सकता है और न ही उनका वध किया जा सकता है.. इसलिए ऐसा उपाय किया जाए की वे अपना धनुष रख दे तब अर्जुन उन्हें अपने बाणों से बिंध दे..


लेकिन उन्हें निहत्था कैसे किया जाए ? इस प्रश्न का उत्तर भी पितामह से माँगा गया तो उन्होंने बताया किन यदि कोई नारी उनके सामने आ जाए तो वे धनुष रख देंगे..
तब कृष्ण ने शिखंडी का रहस्य सभी को बताया की शिखंडी पहले के जन्म में नारी थी और इस जन्म में भी भीष्म उन्हें नारी ही मानते है..

अगले दिन भीष्म को मारने के लिए अर्जुन ने अपने रथ पर शिखंडी को बिठा लिया .. जब युद्ध भूमि में अर्जुन और पितामह का आमना सामना हुआ तो शिखंडी दोनों के बीच में आ गया.. चूँकि भीष्म शिखंडी को नारी मानते थे

इस कारण उन्होंने धनुष बाण रख दिए.. और इसी अवसर का लाभ उठाकर अर्जुन ने गंगापुत्र पर बाणों की वर्षा कर  दी .. अर्जुन ने पितामह पर इतने तीर चलाएँ की उनके पुरे शरीर में तीर आर-पार हो गये और पितामह उन तीरों से जमीन पर आ गिरे .... आर-पार हुए तीरों से बनी शैय्या  पर लेट गये..

इसप्रकार अर्जुन ने उन्हें निहत्था होने पर भी शिखंडी की ओट से तीर चलाकर शरशैया पर लेटा  दिया...


   read - ये मंजिल कैसे मिलेगी
             चन्द्रसेन राठोड़

2.  वीर अभिमन्यु का निहत्थे वध किया गया ..


               महाभारत के युद्ध में गंगापुत्र भीष्म जैसे वृद्ध योद्धा ने भाग लिया तो दूसरी तरफ वीर अभिमन्यु जैसे युवाओं ने भी भाग लिया.. युद्ध ही नहीं लड़ा अपितु ऐसा युद्ध लड़ा की दुश्मन को भी नाको चने चबवा दिए..
अभिमन्यु , अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र था. और श्री कृष्ण का भांजा था.. वीर अभिमन्यु को अस्त्र- शस्त्र चलाना स्वयम श्री कृष्ण ने सिखाया था..

महभारत कजे युद्ध में जब कौरवों के सेनापति गुरु द्रोणाचार्य बने तो उन्होंने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह  की रचना की... उस दिन अर्जुन लड़ने के लिए युद्ध क्षेत्र के दुसरे छोर की और चले गये थे... पांडवों में अर्जुन और श्री कृष्ण को छोड़कर किसी को भी उस व्यूह  को तोडना नहीं आता था..

इस स्थिती  में सभी चिंता में पड़ गये की अब क्या किया जाए? तो उस समय अर्जुन पुत्र वीर अभिमन्यु सबके सामने आया... और सम्राट से कहा की आप चिंता न करे , मै इस चक्रव्यूह  का भेदन करूंगा.. लेकिन अभिमन्यु को चक्रव्यूह  में प्रवेश करना तो आता था उससे बाहर कैसे निकलते है यह उसे पता नहीं था...

बाकि लोगो ने कहा की जब अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेदन करेगा तो हम उसके पीछे पीछे अंदर चले जाएँगे...
लेकिन जब अभिमन्यु ने चक्रव्यूह का भेदन किया तो बाकी लोगो ने भी अंदर जाने का प्रयास किया लेकिन जयद्रथ ने सभी को रोक लिया... इस कारण अभिमन्यु चक्रव्यूह  में  अकेला पड़ गया... वह लड़ते लड़ते अंतिम द्वार पर आया जहाँ पर कौरवों के सभी महारथी मौजूद थे...

अभिमन्यु ने सबके साथ वीरता से युद्ध किया लेकिन उसे वो द्वार तोडना नहीं आता था... तो भी वो प्रयास करता रहा.. कौरवों के यौद्धाओ ने देखा की यह यदि यहाँ से निकल गया तो उनकी नाक कट जाएगी ..ऐसा सोचकर उन्होंने एक साथ अभिमन्यु पर हमला बोल दिया...

इस कारण अभिमन्यु का सारथी मारा गया और उसका रथ भी टूट गया... लेकिन तब भी  वो रथ का पहिया लेकर युद्ध करने लगा.. इस अवस्था में भी कौरवों के सात सात महारथियों ने मिलकर उस निहत्थे वीर बालक का वध कर दिया...

लेकिन अभिमन्यु ने मरकर भी उस दिन का युद्ध जीत लिया और अपना नाम इतिहास में अमर कर दिया...



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3.  द्रोणाचार्य का वध


     गुरु परशुराम के शिष्य और कौरवों व पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य भी उच्च कोटि के योद्धा थे. उन्हें भी मारना  या हराना बहुत मुश्किल था..

गुरु द्रोणाचार्य को भी युद्ध से हटाए बिना पांडव उस युद्ध को नहीं जीत सकते थे..इस कारण श्री कृष्ण ने द्रोणाचार्य को मारने का एक उपाय बताया की -'द्रोणाचार्य को यदि किसी प्रकार से शोक में डाल  दिया जाए तो वे शस्त्र छोड़ देंगे..' और भीम से कहा की तुम अश्वथामा नामक हाथी  को मार दो और गुरुवर से कहो की अश्वथामा मारा गया..

भीम ने ऐसा ही किया .. भीम की बात सुनकर द्रोणाचार्य बहुत दुखी हुए लेकिन उन्हें भीम की बात पर विश्वास नहीं हुआ.. बात की वास्तविकता जानने के लिए उन्होंने युधिष्ठिर  पूछा की यह बात सही है क्या कि -'मेरा पुत्र युद्ध भूमि में मर गया?" तब युधिष्ठिर ने कहा की -' अश्वथामा मारा गया, नर नहीं कुंजर..' लेकिन कुंजर शब्द कहने से पहले ही कृष्ण ने शंख बजा दिया जिससे द्रोणाचार्य उसे सुन नहीं पाये...

और अपने पुत्र शोक में शस्त्र त्याग कर भूमि पर बैठ गये.. उसी समय द्रोपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से द्रोणाचार्य का वध कर दिया...
इस प्रकार दूसरी बार पांडवों ने युद्ध नियम को तोड़ते हुए निहत्थे योद्धा की हत्या कर दी...



4. दानवीर कर्ण का निहत्थे वध किया गया...


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      दानवीर कर्ण कौरवों की सेना के प्रमुख सेनापति थे.  जहाँ पांडवों के पास गांडीवधारी अर्जुन थे तो कौरवों के पास परशुराम शिष्य कर्ण थे... कर्ण महान योद्धा थे.. लेकिन वो अपने पुरे जीवन में सम्मान को तरसते रहे..  उन्होंने परशुराम जी से शिक्षा ग्रहण की लेकिन जब परशुराम को पता चला की कर्ण ब्राह्मण नहीं है. तो उन्होंने उसे शाप दे दिया की जब उसे अपनी विद्या की सबसे अधिक जरूरत होगी तो वो अपनी विद्या भूल जाएगा ...

इस कारण कर्ण जब अंतिम दिन अर्जुन के साथ युद्ध कर रहे थे तो वो अपनी विद्या भूल गये और एक ब्राह्मण के शाप के कारण उनके रथ का पहिया जमीन में धँस गया...

कर्ण अपने अस्त्र शस्त्र छोडकर रथ का पहिया निकाल रहे थे तब अर्जुन ने निहत्थे कर्ण पर दिव्यास्त्र का प्रयोग किया और कर्ण का वध कर दिया..
इसप्रकार उस महान योद्धा का छल से अंत कर दिया गया...


5. भूरिश्रवा का सात्यकी द्वारा वध


    महाभारत के युद्ध में जिन योद्धाओं का निहत्थे वध किया गया उसमे से भूरिश्रवा भी एक थे.. भूरिश्रवा कुरुवंशी थे और वे दुर्योधन की और से युद्ध में शामिल हुए थे...

युद्ध के एक दिन भूरिश्रवा और सात्यकी आपस में युद्ध लड़ रहे थे तब सात्यकी लड़ते लड़ते बेहोश हो गया.. भूरिश्रवा बेहोश सात्यकी को मारना चाहते थे.. उनसे कुछ दूर अर्जुन युद्ध कर रहे थे, उन्होंने भूरिश्रवा के इरादे को भांप लिया और एक ऐसा तीर चलाया की भूरिश्रवा का दाहिना हाथ कट गया..

भूरिश्रवा ने इसे युद्ध नियमों के विरुद्ध बताते हुए युद्ध भूमि में ही धरने पर बैठ गया... तभी सात्यकी को होश आ गया... उसने भूरिश्रवा को समाधि लगाये देखा तो अपनी तलवार से उसका वध कर दिया...
और सात्यकी जैसा वीर ने भी एक निहत्थे योद्धा को मारकर युद्ध नियम को
तोडा था...


दोस्तों इस प्रकार महाभारत के जिस युद्ध को धर्म और अधर्म के मध्य का युद्ध कहा जाता है उसमे कई ऐसी घटनाएँ हुई जो धर्म विरुद्ध थी.. जिसमे मानवता भी शर्मसार हुई और वीरो की वीरता भी कलंकित हुई..


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शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे की जीवनी Bala Saheb Thackeray biography in hindi


बाला साहेब ठाकरे  की जीवनी

इंडिया में ऐसे बहुत से लोग हुए है जिन्होंने अपनी खुद ही पहचान बनाई और अपने समय में उनका कोई सानी नहीं था... ऐसे ही लोगो में से थे बाल केशव ठाकरे जिन्हें लोग बाला साहेब ठाकरे के नाम से बुलाते थे...
बाला साहेब ठाकरे एक ऐसा नाम जिससे अच्छे अच्छे कांपते थे.. उनकी आवाज सुनकर कईयों की हेकड़ी निकल जाती थी.. वो एक शेर थे..बब्बर शेर .. जिसकी एक आवाज से मुंबई खुलती और बंद हो जाती थी...


मराठियों के हकों की लड़ाई से शुरू हुआ उनका कार्य बहुत जल्द हिन्दुत्त्व के लिए बदल गया.. वे खुलकर कहते थे की यदि हिन्दुओं का खुलकर जीना है तो उन्हें लड़ना होगा... यदि सम्मान की जिन्दगी जिनी है तो लड़ों... अपने हक के लिए लड़ो...

बाला साहेब को लोग हिन्दू हृदय सम्राट कहते है...उनका एक किस्सा बहुत जाना माना है - ' एक बार आतंकवादियों ने कहा की कोई भी अमरनाथ के लिए यात्री नहीं जायेगा यदि जायेगा तो जिन्दा वापिस नहीं आएगा ...' इस वजह से अमरनाथ यात्रा पर संकट के बादल मंडराने लगे... तब बाला साहब ने कहा था कि -' हज के लिए 99% फ्लाइट्स मुंबई से जाती है अब मै भी देखता हु कोई मक्का मदीना कैसे जाता है?'
और इस बात का इतना असर हुआ की अगले ही दिन अमरनाथ यात्रा शुरू हो गई...
आज हम ऐसे ही बाला साहेब के जीवन के बारें में पढ़ने -----

bala saheb thsckeray biography

बाला साहेब का परिचय  ( Introduction)


 नाम - बाल केशव ठाकरे 
जन्म - 23 जनवरी 1926 
पिता - केशव सीताराम  ठाकरे  (प्रबोधनकर )
माता - रमा बाई
कार्य -  कार्टूनिस्ट और राजनीति
पार्टी -  शिव सेना
मृत्यु -  17 नवम्बर 2012

 प्रारम्भिक जीवन परिचय ( Early Life Of Bala Saheb Thackeray )

बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1928 को पुणे में हुआ था .. रमा बाई और केशव सीताराम ठाकरे उनके माता-पिता थे.. बाल ठाकरे के पिताजी सामाजिक कार्यकर्ता थे और उनके ही व्यक्तित्व का प्रभाव बाला साहेब पर भी बहुत पड़ा.. बाला साहेब  उनकी तरह सीधी बात कहते थे और वो जो भी बात कहते थे उसे सीना ठोक कर  कहते थे..

बाला साहेब ने कार्टूनिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी.. वे free press journal मुंबई के लिए cartoon बनाते थे..उनके कई कार्टून The Times Of India में भी छपे थे.. बाला साहब अपने कार्टून में बहुत तीखे हमले करते थे.. वे एक बार सोच लेते की आज मुझे उस पर कार्टून बनाना है तो वे उस पर कार्टून बना कर ही दम  लेते थे ...




उसके बाद में बाला साहब ने 1960 में  स्थानीय भाषा में मार्मिक नामक पत्रिका अपने भाई श्रीकांत ठाकरे के साथ मिलकर निकाली..और बाला साहब उसमें तीखे हमले करते कार्टून  छापने लगे.. उन्होंने कझा था कि ' यह पत्रिका उनके परिवार के भरण - पोषण के के लिए है '... और ऐसा सिर्फ वो ही कह सकते थे..


बाला साहेब का निजी जीवन ( Personal Life )
बाला साहब ठाकरे का विवाह मीना ठाकरे ( सरला वाडिया) के साथ 13 जून 1948 को हुआ था.. मीना कुमारी को सभी मीना ताई के नाम से जानते थे.. और मीना ताई ने बाला साहब के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई..

बाला साहब और मीना ताई के तीन पुत्र हुए -  बिंदुमाधव, जयदेव और उद्धव ठाकरे...
बाला साहब के जीवन में 1995 का काल उनपर काल बनकर टुटा.. उनकी जीवन संगिनी का इस वर्ष निधन हो गया और अगले ही वर्ष उनके बड़े बेटे बिंदुमाधव का कार एक्सीडेंट में निधन हो गया ...

बाला साहेब और मराठी मानुस का मुद्दा

           बाला साहब ने मार्मिक पत्रिका के माध्यम से मराठी मानुस का मुद्दा उठाया.. उन्होंने मराठी लोगो के हित में कई कार्टून भी बनाये..

 गुजरातियों और दक्षिण  भारतियों के महाराष्ट्र में व्यवसाय अधिक थे और उसमें मराठी लोगो को नौकरी नहीं मिलती थी..यदि कई मिलती भी तो बड़े बड़े ओहदे नहीं मिलते है...

दक्षिण भारतीय  को वहां से हटाने के लिए एक नारा दिया -"लुंगी हटाओ- पुंगी बजाओ" .. और इस आन्दोलन के तहत वहां पर दक्षिण भारतियों के office में तोड़ फोड़ की और उनके साथ मारपीट भी की गई...

1969 में बाला साहब को गिरफ्तार किया गया ...लेकिन उनके समर्थको ने मुंबई में भयंकर माहौल बना दिया और वहां पर पुलिस भी फ़ैल होने लगी.. तब तत्कालीन मुख्यमंत्री  ने बाला साहब से विनती की और उनसे लोगो से अपील करने के लिए आग्रह किया... जो भीड़ पुलिस और प्रशासन शांत नहीं कर सकी वो भीड़ बाला साहब के एक अपील से शांत हो गई ...
यह सब बाला साहब के रुतबे और उनकी पॉवर का प्रभाव था..

शिव सेना की स्थापना 

  बाला साहब ने 19 जून 1966 में नारियल फोड़ कर शिव सेना की स्थापना की .. और शिव सेना की स्थापना मार्मिक पत्रिका की सफलता से ही प्रेरित हो कर की गई.. जब पार्टी की पहली बैठ बुलाई गई तो उसमे पचास हजार लोगो के बैठने की व्यवस्था की गई लेकिन तब वहां पर करीब दो लाख लोग आये और यहाँ से ही बाल केशव ठाकरे , बाला साहब ठाकरे के नाम से पहचाने जाने लगे...


शिव सेना की जब स्थापना की गई तब यह शांत सगंठन  था और मराठी लोगों के मुद्दे उठाता था.. उससे मराठी लोगो का जुडाव शिव सेना के साथ बढ़ने लगा ... शिव सेना ने 1968 में मुंबई की BMC के  चुनाव में भाग लिया और 40 मेंसे 15 सीटों पर कब्जा जमा लिया..

यहाँ से politics में आई शिव सेना ने 1974 में BMC पर जीत हासिल की और 1985 के बाद BMC पर लगातार जीतती आ रही है...

1989 में मराठी में सामना दैनिक की शुरुआत की गई... और यह अख़बार अपनी तीखी टिप्पणी के लिए जाना जाता है..

शिव सेना ने 1995 में भारतीय जनता पार्टी के साथ हाथ मिला लिया और विधानसभा पर कब्जा जमा लिया...शिव सेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने..


बाला साहेब के वे कार्य और बयान जो उन्हें खास बनाते है..

  बाला साहब अपने तरीके के अकेले नेता थे वो अपने बेबाक बोलो के लिए जाने जाते थे.. और वे जो भी कहते थे सोच समझकर कहते थे लेकिन एक बार जो बात कह देते थे वो पत्थर की लकीर हो जाती जाती...

  1. 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मंजिद को गिराया गया तब सभी लोग ना नुकर करने लगे थे तब आप की अदालत में बाला साहब से सवाल किया गया की- ' क्या मंजिद  गिराने में शिव सैनिकों का हाथ है?'
     तब बाला साहब ने कहा था कि -' यह तो शिव सैनिको और हमारे लिए गौरव की बात है...'यदि अपने आप को बनाये रखना है तो हिन्दुओं को खड़ा होना होगा..'
     
  2. जब इंदिरा गाँधी ने जब 1975 में आपातकाल लगाया था तब बाला साहब ठाकरे  ने इंदिरा जी  के इस कदम का समर्थन किया था...
     
  3. बाला साहेब हिटलर और श्रीलंका के सगंठन लिट्टे के मुरीद थे..
     
  4. 2007 के राष्ट्रपति के चुनाव में जब NDA ने भैरू सिंह जी का समर्थन किया था तब बाला साहब ने श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का समर्थन किया था...  क्योंकि प्रतिभा पाटिल मराठी थी..
     
  5. एक बार बाला साहब ने मुसलमानों को कैंसर तक कह दिया था..
     
  6. बाला साहब में एक ख़ास बात थी कि वे किसी से मिलने नहीं जाते थे जिसको मिलना होता था वो मातुश्री में आता था...
     
  7. बाला साहब ने वीपी सिंह द्वारा लाए गये मंडल कमिशन का विरोध किया था.. और इसी कारण उनके एक साथी छगन भुजबल ने शिव सेना से खुद को अलग कर लिया था...


बाला साहेब पर वोट देने का प्रतिबंध

  बाला साहब के जीवन में कई उतार-चढाव आये.. वे अपने विवादित बोलो के कारण हमेशा चर्चा में रहते थे.. और कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा था..

एक बार बाला साहब पर चुनाव में वोट डालने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था... बात है सन 1999 की .. जब चुनाव आयोग ने बाला साहब को  मत डालने के अधिकार से वंचित कर दिया था... चुनाव आयोग ने 28 जुलाई 1999 को बाला साहब के voting rights पर 6 साल के लिए  banned लगा दिया था.  इस कारण वे 11/12/1999 से 10/12/2005 तक उन के मत डालने पर रोक लगी रही...
बाला साहब ने एक बार भी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन उनका रुतबा महाराष्ट्र में CM से कम नहीं था...उनकी एक आवाज पर हमेशा चलने वाली मुंबई बंद हो जाती थी.. उनका प्रभाव ऐसा था  की उनके विरोधी भी उनसे मिलने आते थे..

बाला साहेब ठाकरे की मृत्यु

    बाला साहब अपने जीवन के अंतिम दिनों में बहुत कमजोर हो गये थे... और वे अधिकतर समय अपने निवास मातुश्री में ही रहते थे.. बाला साहब हमेशा  दशहरा पर भाषण देते थे लेकिन  2012 के दशहरे के मौके पर हमेशा अंगारों की भाषा बोलने वाला भाषण देने नहीं आया और घर से ही video live के माध्यम से भाषण दिया था...

और लाखों दिलों की धडकन , हजारों लोगो के आदर्श और हिन्दू हृदय सम्राट बाला साहब ठाकरे ने 17 नवम्बर 2012 को अंतिम साँस ली...  बाला साहब के निधन की खबर से हमेशा चलने वाली मुंबई अपने आप बंद हो गई थी..


लाखों लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए और करोड़ों लोगों ने टीवी के माध्यम से लाइव देखा था....
बाला साहेब को 21 तोपों की सलामी दी गई जबकि वे न तो राष्ट्रपति थे और न ही प्रधानमन्त्री .... ये सब बाला साहब का रुतबा और उनका प्रभाव था....

बाला साहब का अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क में किया गया... और एक बब्बर शेर पंच तत्वों में विलीन हो गया...बाला साहब के साथ ही एक युग का अंत हो गया...





बाला साहब की जीवनी आपको कैसी लगी? आप कमेंट्स  करके जरुर बताएं और यदि अच्छी लगे तो अपने दोस्तों के साथ जरुर शेयर करे.....

NOTE - यदि आपको हमारी इस post में कोई गलती नजर आती है तो हमे जरुर बताएं और यदि आपके पास बाला साहब से जुडी कोई जानकारी हो तो हमारे साथ जरुर शेयर करे....

ये मंजिल कैसे मिलेगी? Best motivational poem in hindi

युवाओ के लिए प्रेरणादायी कविता

ये मंजिल कैसे मिलेगी?

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ये मंद मंद गति क्यों?
ये अलसाई सी अंगड़ाई क्यों?
किसकी आस में तुम बैठे हो,
राह किसकी तुम देखते हो।

क्यों हवा में महल बनाते हो?
क्यों सपनों मे ही खोते हो?
हाथ मलोगे, जब   सुबह होगी,
क्यों जीवन ऐसे गंवाते हो?

शल्य बने बैठे है जग में,
रथ धंसा देंगे जमीं में।
बना निहत्था तुझे,
मस्तक कौन्तेय से कटवा देंगे।

जब बाण चढ़े थे गांडीव पर,
तब हक पांडवो को मिला था।
बढा हाथ जब धनु को,
तब सिन्धु कदमों  में पड़ा था।

न पाँव जमीं पर न हाथ धनुष पर,
ये विजय तुम्हे कैसे मिलेगी?
मांगे न भीख मिलती,
ये मंजिल तुम्हे कैसे मिलेगी?

viram singh poem





विरम सिंह सुरावा


ओर कविताएँ 




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ख़ुशी, जोश, उमंग और उजाले के त्योहार दीपावली की सभी को हार्दिक बधाई... आप सभी अपने जीवन में दिन दुगुनी रात चौगुनी वृदि करे.. आपका जीवन सुखमय और मंगलमय हो ... आज इस दिवाली के पावन पर्व के मौके पर gyandrashta.com की तरफ से सभी पाठको के लिए परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है... 

दीपावली पर निबंध | Essay On Deepawali In Hindi 2018


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सभी पाठकों को दीपों के त्यौहार दीपवाली की हार्दिक बधाई... आपका जीवन खुशियों से भरा रहे, सुख-समृद्धि आपके द्वार रहे......
 
दोस्तो हमारा देश पर्व और त्योहारों का देश है । यहा पर Everyday कोई न कोई Festival जरूर Celebrate किया जाता है।
Friends Festival हमारे मन मे उमंग और उत्साह का संचार करते है। India मे हिन्दू हो या मुसलमान या जैन सभी धर्म के उत्सव हर्षोल्लास से मनाते है ।
होली, दीपावली, रक्षाबंधन, आखातीज, करवा चौथ, कजली तीज, जन्माष्टमी, गणगौर आदि हिन्दुओ के प्रमुख त्योहार है । इनके अलावा भी बहुत से Festival Celebrate किए जाते है ।
दीपावली हिन्दुओ की Most festival है । आज हम दीपावली पर सम्पूर्ण जानकारी देगे।

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दीपावली पर निबंध 

     In This Post
1. दीपावली क्यों मनाई जाती है? Diwali Kyo Manate Ha?
2. दीपावली कब मनाई जाती है? When Diwali Celebrate?
3. दीपावली कैसे मानते है? How To Celebrate Diwali?
4. दीपावली का महत्व।


1. दीपावली क्यों मनाई जाती है? Diwali Kyo Manate Hai?

      Friends कई लोगो के मन मे questions होगा कि दिवाली क्यों मनाई जाती है ? तो आपके सवाल का जवाब अब मिल जाएगा।
दिवाली मनाने के पीछे एक बहुत बडा कारण है ।
दिवाली क्यों मनाते है?
      रामायण काल की बात है । जब प्रभु श्रीराम लंका नरेश रावण का वध करके और 14 वर्ष का वनवास पूर्ण करके जब अयोध्या वापिस लौटे थे तब अयोध्या वासियों से खुशी से पुरे अयोध्या नगर को दीपक से सजा दिया । और चारो दीपक ही दीपक थे और उनका प्रकाश से पुरा नगर जगमगा गया। इस कारण हम इस को दीपावली या दिवाली कहते है।

   भगवान श्रीराम के पिता के दिए वचन निभाने के लिए 14 वर्ष का वन मे व्यतीत किए वो हमारे सामने पितृभक्ति का अनूठा उदाहरण है । श्री राम के अयोध्या लौटने की खुशी मे हि दीपावली ( Deepawali ) का त्योहार मनाया जाता है।

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दीपावली कब मनाई जाती है?

      Friends Diwali Festival प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है । कहा जाता है कि जब भगवान अयोध्या पधारे थे, तब अमावस्या थी और दीपकों की रोशनी से अमावस्या की रात्रि को पूर्णिमा की रात्रि बना दिया ।
विशेष :- दोस्तो इस बार की दीपावली  कार्तिक मास की अमावस्या दिनांक 7 नवंबर , 2018  को मनाई जाएगी ।

दीपावली कैसे मनाते है?

     दिवाली को बड़े ही शानदार तरीके से Celebrate किया जाता है।  दिवाली की रात्रि ( अमावस्या की रात्रि ) को सभी लोग अपने घरो को दीपकों की रोशनी से सजाते है। 
युवा इस दिन पटाखे उर आतिशबाजी करके श्रीराम के अयोध्या लौटने की खुशी मनाते है। इस दिन विशेष पूजा पाठ भी किया जाता है।



दीपावली का महत्व

      Friends दिवाली का पर्व अपने आप मे एक प्रेरणादायी त्यौहार है । जब दीपक की रोशनी से सारा आसमान जगमगाता है तो मन मे एक नवीन प्रकार की ऊर्जा का संचार होता है जो की Body और Mind दोनो के लिए Useful होती है।
दिवाली के दिन सभी भाई लोग आपस मे मिलते है जिससे भाईचारा बढता है ।
दीपावली धर्म पर चलने का तथा अपने वचन को निभाने का हौसला बुलंद करती है ।

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दीपावली पर मनाए जाने वाले त्यौहार


      दोस्तो Diwali तो कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है । लेकिन इससे Related ओर भी त्यौहार मनाए जाते है - 

  नवरात्रा
          दिवाली से 20 दिन पहले अश्विन शुक्ल पक्ष एकम् से नवम तक देवी के नौ रूपो की पूजा की जाती है। 

   विजयादशमी
          अश्विन शुक्ल पक्ष दसम् को विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है । इस दिन श्रीराम ने रावण का वध किया था इसलिए इस दिन रावण, कुम्भकर्ण और इन्द्रजीत के पुतले जलाए जाते है । 

    धनतेरस
        इस दिन धन की देवी लक्ष्मी जी की पूजा अर्चना की जाती है । यह त्यौहार कार्तिक कृष्ण पक्ष की 13  को मनाया जाता है। इस दिन खरीदारी करना शुभ माना जाता है ।

     रूप चतुर्दशी
   यह त्यौहार दिवाली से एक दिन पहले कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की 14 को मनाया जाता है। इस को छोटी दीपावली भी कहते है ।
इस दिन स्त्रियाँ सुबह जल्दी उठकर स्नान करती है और सुन्दर रूप की कामना करती है ।

 गोवर्धन पूजा
   जब इन्द्र देव ने गोकुलवासियों से नाराज होकर उन्हे सबक सीखाने के लिए जोरदार बारिश की तब श्री कृष्ण ने अपनी एक अगुंली पर गोवर्धन पर्वत को उठा कर गोकुल के लोगो की रक्षा की थी । इसलिए इस दिन को गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है।
यह पूजा कार्तिक शुक्ला एकम् को की जाती है । 


    भैयादूज
         भाई - बहन का त्यौहारी भैयादूज कार्तिक शुक्ला द्वितीया को मनाया जाता है ।
   
    
दोस्तो आपको हमारा यह " दीपावली पर निबंध " Post कैसी लगी । यदि आपके पास भी दीपावली से जुडी कोई कहानी हो तो हमारे साथ comments box मे जरूर share करे ।


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यादें 35 नंबर की .... best hindi emotional story

Heart Touching Story  in hindi



लम्बे वक्त तक साथ रहने के बाद एकाएक बिछुड़ना कठिन होता है.. मन को समझान पड़ता है.. जिस जगह पर रहे है उसका हर कोना कुछ न कुछ याद दिला जाता है ... मैने भी 3 घंटे अकेले ऐसे ही सवाल पूछते कमरे में बिताये.... इस से अधिक मैं वहाँ रुक न सका... 

heart touching story

Yaden Room  Number 35 Ki


याद जब आती है तो मेलें में अकेला कर जाती है, हजारों के पास होने पर भी किसी के न होने का अहसास दिला जाती है.. जिस स्थान से जो यादें जुडी होती है वो जगह हर क्षण गुजरे कल के उन पलों की याद दिलाती है.. उनसे जुडी हर वस्तु उनके पास न होने पर भी पास होने का अहसास दिला अकेलापन महसूस करा देती है...

 ऐसी ही कुछ यादें जुडी हुई है 35 नंबर के साथ... वैसे 35 नंबर न कोई lucky नंबर है और न ही किसी महबूबा के मकान का नंबर है .. उदयपुर में फतेहसागर झील जहाँ कितने ही  मजनूं अपनी लैला की तलाश में शाम के समय भँवरे की भांति मंडराते है .. किसी को तो कली मिल जाती है तो किसी को मुरझाएं हुए फूल से ही संतोष करना पड़ता है...

उसी झील से थोड़े से फासले पर स्थित विद्या भवन के जुबली हॉस्टल के प्रथम तले का कमरा, जिसे सब रूम नंबर 35 के नाम से जानते है. कॉलेज जीवन के सबसे यादगार पल हॉस्टल के ही होते है और ऐसी ही कुछ यादें इस कमरे के साथ जुडी हुई है...

पिछले दो बसंत से यह कमरा अपने बाशिंदों की चहलपहल से आबाद रहा..वैसे तो इस कमरे पहले भी कई मुसाफिर रह चुके है परन्तु हम जैसा कोई राहगीर नहीं मिला होगा...


मिलकर किसी को रुलाना, फिर रोते को हंसाना;
हो चाहें ख़ुशी या गम हर पल को साथ में जीना...


यही विशेषताएँ यहाँ के बाशिंदों को ओरों से अलग करती थी....

कॉलेज खत्म होने के बाद सब साथी अपने अपने गाँव की ओर प्रस्थान कर चुके थे.. लेकिन मैं पहले ही यहाँ रहने का निश्चिय कर चूका था मगर मुझे अपना निश्चिय इतना जल्दी बदलना पड़ेगा, मुझे भी पता नहीं था.. वैसे भी भविष्य को किसने देखा है जब होता है तब ही पता लगता है की क्या होने वाला था, और कभी कभी तो होने के बाद ही पता चलता है...

सभी को विदा करने के बाद पीछे रह गये थे मै और 35 नंबर वाला कमरा...जो अपने में २ बसंत की यादों को समेटे किसी के होने का अहसास दिलाता था...सभी को विदा  करने के बाद कमरे में आकर लेट गया और अपने में ही खो गया... तभी लगा कोई बरामदे में टहलते हुए जोर जोर से गा रहा है-

"बन्ना थारे धुंधलियाँ धोरां में
  म्हारी चलती मोटर थाकी....."


गीत के बोल रिपीट हो रहे थे और आवाज तेज हो रही थी...उसने गाना बंद किया और कहने लगा -'बाबु....ऐ बाबु... बाबु.....उठ जा बाबु... '

'जसवीरसा!' मैने जोर से पुकारा, सामने से कोई जवाब नहीं आया...

अपने आप को सम्भालते हुए उठ बैठा और अपने आसपास देखा तो पाया की कमरे में तो अकेला ही हूँ ऊपर छत पर लगा पंखा धीमी गति से घूम रहा था और मच्छर भिनभिना रहे थे..खिड़कियाँ बंद थी और कुर्सियां किसी के बैठने के इंतजार में पलक पावड़े बिछाए खड़ी थी...

अभी उठ कर अंगड़ाई ही ली थी कि लगा कोई कह रहा है-'जरा धीरे से, आवाज मत करों, जसवीरसा पढ़ रहे है... पलट कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था..

दरवाज़ा, खिड़कियाँ, टेबल, कुर्सियाँ सबको देख ऐसा लग रहा थी की यह कुछ कहना चाहते है... जब हम अकेले होते है तो हवाएँ भी बातें करती है, खिड़कियाँ किसी की याद दिलाती है, पंखा भी बतियाता है बस जरूरत होती है तो सुनने वाले की .... आज  अकेला था  मुझे भी किसी की जरूरत थी और उन्हें भी किसी की जरूरत थी...


इस बात को समझते हुए दरवाजे के पास वाली टेबल बतियाने लगी -'  मुसाफिर! कहाँ गये तेरे वो हमराही....? कहाँ गया वो आशिक दीवाना...? जिसके हाथो के प्रहारों  को मैने कई बार झेले है...जब वो रात रात भर जागता
था तब मैने उसे अपनी गोद में सुलाया है... बताओं कहाँ गया वो...?

पर मैं चुप था....

बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए उसने पुछना जारी  रखा ....'सब के सुख दुःख का साथी; सैकड़ों दिलों का राजा... अपने अंदर रहस्यों का समन्दर रखने वाला वो बाशिंदा कहाँ गया,,,?'

'किसी को हंसाने से पहले खुद ही हंस जाता, जब हंसता तो खुद को ही नहीं सम्भाल पाता.... हँसना - हँसाना ही उसका काम था वो गोल-मटोल , जोली कहाँ गया?'

लेकिन मैं फिर भी चुप था.... बोलकर क्या बताता की अब तेरे बाशिंदे नये ठिकाने पर चले गये है तो उसे कितना दुःख होता,,,,,

लेकिन वे अब भी कातर दृष्टि से मुझे देख रहे थे जैसे अब मेरे होठ खुलंगे और जवाब देंगे... पर मै तो खुद ही अकेला था... क्या करता... जब उनकी दृष्टि मुझ पर से नहीं  हटी तो मैने अपनी आँखे बंद कर ली...

परन्तु जिस प्रकार पानी देखने से प्यास नहीं बूझ सकती उसी प्रकार आँखे बंद कर लेने से सामने जलती आग नहीं बूझ सकती... लेकिन ओर करता भी क्या?

जब भी कमरे से ध्यान हटाने की कोशिश करता तो लगता कोई गा रहा है -
:
 "ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना
नही फिर जाना तू अपनी ज़ुबान से
के तेरी नैना है शराब बेईमान से
ओ मतवाली यह दिल क्यूँ तोड़ा
यह तीर काहे छ्चोड़ आ नज़र की कमान से
के मार जायुंगा मैं बस मुस्कान से "

पर आखों के आगे तो सब सुना सुना था न कोई फिरकी वाली थी न ही कोई साथी  था....

तभी सोचा उठ कर कुछ खा लूँ पर याद आया गुड-चने रखने वाला तो अब यहाँ नहीं है फिर भी मन कठोर कर हल्के हाथो से अलमारी को खोला...तो सामने का नज़ारा देख हक्का बक्का रह गया.. अंदर कुछ मच्छर खो-खो खेल रहे थे दोएक ने तो मुझे विपक्षी टीम का समझकर आउट कर दिया... मैने भी उनके खेल में दखल नहीं देते हुए अलमारी को जैसे खोली थी ऐसे ही बंद कर दी....

मन बहलाने के लिए उठ कर बरामदे में आ गया परन्तु यहाँ भी एकांत था.. जो कभी मुझे पसंद था लेकिन आज विष बाण की भांति चुभ रहा था... थोडा टहल कर पुन: कमरे में आ गया...


पंखा अब भी धीमी गति से चल रहा था और मैने भी उसे तेज़ करने की कोशिश नहीं की, पलंग पर बिस्तर आधा समेटा पड़ा था...दिवार वाले हेंगर पर एक आधा  काला आधा सफेद  पेंट लटक रहा था जो अपने पर गिरती पपड़ी से असली रंग के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, पास में ही लटकता मटमैला कमीज जिसमे से झांकते कुछ सफेद बिंदु कमीज के कभी सफ़ेद होने का अहसास दिला रहे थे...
 

इन सब के अलावा कमरे में मैं और अलमारी में वो खो खो खेलते मच्छर थे...

इस अनचाहे एकांत में जो लम्हे याद आ रहे थे वो किसी पत्थर को भी पिघला सकते थे ...लेकिन अब वो सब कहाँ जो हमने साथ में बिताया.....


 रात-रात भर चलती बातें
जाग कर बिताई वो रातें
कभी अपना, कभी उसका हाल सुनाते
कुछ अपनी, कुछ उनकी सुनते-सुनाते
साथ गाते, साथ पीते
हर पल को साथ ही जीते ...
     
उन साथ बिताएं लम्हों की यादे तीर की भांति दिल को चुभ रही है पर नम आंखे हो रही है...
वैसे तो कुछ बसंत का साथ था अपना पर लगता है जैसे युगों युगों के हमराही आज बिछुड़ गये हो...
अब 35 नंबर की प्रत्येक वस्तु सवाल कर रही है... बीते पलों को याद दिला रही है... इन सब के बीच अकेले रहना बहुत मुश्किल हो रहा है इसलिए अपने निश्चिय को बदलकर रूम नंबर  35 को अलविदा कह रहा हूँ...

 यह कमरा अब अकेला हो जायेगा और इंतजार करेगा अपने नये बाशिंदों का ताकि उन्हें वो अपने  सिरफिरे, अलबेले बाशिंदों की कहानी सुना सके.... अपना दर्द बयाँ कर सके....


viram singh story

विरम सिंह देवड़ा 


वनशाला शिविर के अनुभव
माँ का ख़त बेटे के नाम
महिलाओं पर कविता

सरदार पटेल के जीवन के 2 प्रेरक प्रसंग | 2 motivational story in hindi



सरदार वल्लभ भाई पटेल को लौहपुरुष के नाम से जाना जाता है. सरदार पटेल का पूरा जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है. उन्होंने अपने जीवन में कई कठिनाईयों का सामना किया और उन पर विजय प्राप्त की इसलिए तो इन्हें लौह पुरुष कहा जाता है.

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प्रेरक प्रसंग #1

 sardar vallabhai patel के पिताजी किसान थे और सरदार पटेल जब छोटे थे तब वे अपने पिताजी के साथ खेत पर जाते थे. एक दिन सरदार पटेल के पिताजी खेत में हल चला रहे थे और सरदार पटेल उनके साथ साथ चलते हुए पहाड़े याद कर रहे थे. वे याद करने में पूरी तरह से तन्मय हो गये और हल के पीछे चलते चलते उनके पांव में कांटा लग गया परन्तु सरदार पटेल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा तथा वे उसी तन्मयता से पहाड़े याद कर रहे थे. तभी अचानक उनके पिताजी की नजर वल्लभ भाई के पांव पर पड़ी तो पांव में बड़ा सा कांटा देखकर एक दम से चौक गये. और तुरंत बैलों को रोककर वल्लभ के पैर से कांटा निकाला और घाव पर पत्ते लगाकर खून को बहने से रोका.
      सरदार पटेल की इस तरह की एकाग्रता और तन्मयता देखकर उनके पिताजी बहुत खुश हुए और उन्हें जीवन में कुछ बड़ा करने का आशीर्वाद दिया. और उनके इस आशीर्वाद को सरदार पटेल ने बखूबी सफल किया.

शिक्षा
   दोस्तों जब भी हम कोई कार्य करते है तो हमारा ध्यान पूरी तरह से उस काम में होना चाहिए तभी हम सक्सेस हो सकते है. और हमारी लाइफ में इस तरह के संकट (कांटे) बहुत आते है बस आपको अपने काम पर लगे रहना है.

प्रेरक प्रसंग #2 

 

sardar-patel

 



      सरदार पटेल की सहनशीलता


सरदार पटेल ने 1990 में तीन वर्षीय जिला मुख्तारी का कोर्स करने के बाद वे पैसे कमाने के लिए अपने मित्र कशीभाई के पास आ गये और अपनी योजना को कार्यरूप देने लग गये. 
    जब पटेल अपने मित्र के पास रह रहे थे तब उनकी कांख में फोड़ा हो गया. बहुत इलाज करवाया, लेकिन फोड़ा ठीक नहीं हुआ. इसलिए यह निश्चित किया गया की फोड़े में चीरा लगवाया जाए. चीरा लगवाने के लिए वे एक नाई के पास गये. नाई ने चीरा लगाने की बजाय गर्म सलाखों से जलाना ठीक बताया और इसलिए सलाखे गर्म की गई लेकिन नाई फोड़े को जलाने से घबराने लगा. सरदार पटेल ने उसकी बात को समझ लिया और स्वयं ने ही गर्म सलाखों से फोड़े को जला दिया. यह देख कर नाई घबरा गया और देखने वाले भी वल्लभ की इतनी सहनशक्ति देखकर हैरान रह गये.

 शिक्षा-
    यदि आपको अपनी लाइफ में सक्सेस होना है तो आपमें सहन शक्ति बहुत आवश्यक है. परेशानी रूपी फोड़े को स्वयम ही जलाना होगा अर्थात संकट का स्वयम ही निस्तारण करना होगा दूसरा कोई नहीं करने वाला.



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