हिन्दुवा सूरज महाराणा प्रताप की जीवनी | maharana pratap biography in hindi



महाराणा प्रताप की जीवनी

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   महाराणा प्रताप भारत के ही नहीं अपितु विश्व के महान स्वतंत्रता प्रेमी में गिने जाते है। जब अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन भारत आ रहे थे तो उन्होंने अपनी मां से कहा की आपके लिए क्या लेकर आए तो उनकी माँ ने कहा था की ला सके तो प्रताप की जन्म भूमि मेवाड़ की मिट्टी लेकर आना।  जिस की मृत्यु पर उसका दुश्मन भी रो पड़ा था ऐसे प्रताप की जीवनी हम published कर रहे है।

 महाराणा प्रताप का इतिहास


नाम- महाराणा प्रताप सिंह
जन्म – 9 मई, 1540
जन्म स्थान- कुम्भलगढ़
पिता- महाराणा उदय सिंह
माता- जयवंता बाई
पत्नी- 11 विवाह किए ( महारानी अज्बदे )
पुत्र – 16 पुत्र ( अमर सिंह सबसे बड़े)
प्रमुख युद्ध – हल्दीघाटी और दिवेर
धर्म- Hindu



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प्रताप का प्रारम्भिक जीवन

   maharana pratap का जन्म 9 मई, 1540 में महाराणा उदय सिंह की पटरानी जयवंता बाई की कोख से कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। प्रताप का ननिहाल पाली के सोनगरा अखैराज के वहां था। प्रताप के बचपन का नाम कीका था। प्रताप बचपन से ही शूरवीर और पराक्रमी थे। वे सब भाईओं में बड़े थे परन्तु महाराणा उदय सिंह ने उनकी जगह जैसलमेर की भाटी  राजकुमारी धीर बाई के कोख से जन्मे जगमाल को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया ।

प्रताप का राजतिलक

  महाराणा उदय सिंह का 28 फरवरी, 1572 को निधन होने पर उनके स्थान पर जगमाल राजगद्दी पर बैठा। लेकिन प्रमुख सरदारों ने उदय सिंह के क्रिया कर्म के बाद प्रताप को महाराणा बना लिया। बालक कीका 32 वर्ष की आयु में 1572 में मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा और कहलाने लगा महाराणा प्रताप।

अकबर द्वारा समझौते के प्रयास

    जिस समय प्रताप का राजतिलक हुआ उस समय दिल्ली का शासन मुगल सम्राट अकबर के हाथ में था। अकबर बहुत ही निर्दयी शासक था जिसने 1567 में मेवाड़ में 30 हजार लोगो का नरसंहार करवाया था जिसमे बच्चे और महिलाएँ भी शामिल थी। अकबर पुरे हिन्दुस्तान पर कब्जा करना चाहता था पर मेवाड़ उसकी रहा का रोड़ा बन रहा था इसलिय उसने अपनी कूटनीति से मेवाड़ को अपने पक्ष में करने के लिए प्रताप के पास संधि के लिए दूत भेजे। 
        अकबर ने क्रमश: जलाल खान, कुंवर मान सिंह, राजा भगवंतदास और राजा टोडरमल को भेजा किन्तु कोई भी व्यक्ति प्रताप के संकल्प को तोड़ नहीं सका और न ही प्रताप को अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए मना सका|

हल्दीघाटी का युद्ध

   जब महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया तो अकबर ने मेवाड़ पर हमला करने के लिए आमेर के कुँवर मान सिंह को 1576 में भेजा। महाराणा को जब इसकी सुचना मिली तो वो भी अपनी सेना लेकर गोगुन्दा आ गये।
         
        महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के मध्य हल्दीघाटी के मैदान (रक्त तलाई) में 18 जून, 1576 को भयंकर युद्ध हुआ। इसे हल्दीघाटी का युद्ध कहा जाता है। इसमें अकबर की सेना का नेतृत्व मान सिंह कर रहे थे और मेवाड़ की तरफ से महाराणा समेत कई सामंत युद्ध कर रहे थे।
     
         इस युद्ध में अकबर की सेना में लगभग 80 हजार सैनिक थे जबकि मेवाड़ की सेना में सिर्फ 20 हजार सैनिक थे। इतना अंतर होने के बाद भी राजपूत सरदारों ने मुगलों के छक्के छुड़वा दीए।
         
     युद्ध करते समय महाराणा के घोड़े ने अपने पांव मान सिंह के हाथी के सर पर रख दिए थे और महाराणा ने मान सिंह को मरने के लिए भाला फेका लेकिन मान सिंह बाख गया किन्तु हाथी का महावत मारा गया।लेकिन हाथी ने तलवार के वार से चेतक के एक पांव को काट दिया। लेकिन इसके बावजूद चेतक अपने तीन पैरों पर ही युद्ध के मैदान में दौड़ रहा था।


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एक समय ऐसा आया जब महाराणा प्रताप मुगलों से गिर गये तब झाला मान सिंह ने चँवर धारण करके महाराणा को युद्ध के मैदान से निकाला था और उनके शहीद होते ही युद्ध समाप्त हो गया किन्तु मुगल न तो महाराणा को पकड़ सके और न ही उन्हें झुका सके ।



हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी अकबर ने कई बार महाराणा पर आक्रमण किया परन्तु छापामार पद्धति से युद्ध करने में माहिर भीलो के सहयोग से महाराणा ने हर बार मुगलों को मात दी।

दिवेर का युद्ध

    मेवाड़ को मुक्त कराने का अभियान महाराणा ने डाइवर से शुरू किया और उन्होंने अक्टूम्बर, 1582 को मुगलो पर हमला कर उन्हें बुरी तरह से पराजित कर दिया। इस जीत ने महाराणा की ख्याति चारों ओर फैला दी।
         
          दिवेर युद्ध के बाद केवल एक बार अकबर ने महाराणा पर हमला करने के लिए सेना भेजी पर वो भी सफल नहीं हुई उसके बाद अकबर ने मेवाड़ पर ध्यान देना बंद कर दिया इसे अपनी विवशता द्वारा अकबर की परोक्ष संधि कह सकते है ।

राजधानी

   mahrana pratap ने 1885 में चावंड को अपनी नई राजधानी बनाया चावंड 28 वर्षो तक मेवाड़ की राजधानी रहा। महाराणा अमर सिंह के भी राजकाज के आरम्भिक 16 साल चावंड में ही गुजरे।

मृत्यु

   चावंड गाँव से थोडा दूर एक पहाड़ी पर pratap ने अपने महल बनवाए । लेकिन 19 जनवरी, 1597 को महाराणा प्रताप का आकस्मिक निधन हो गया और डूब गया हिन्दुवा सूरज।
  उनका अंतिम संस्कार बांदोली गाँव के पास किया गया जहां पर उनकी छतरी बनी हुई है।
 महाराणा की मौत की खबर जब अकबर तक पहुंची तो यह समाचार सुनकर अकबर भी रो दिया था।

इस प्रकार इस महान देशभक्त और आजादी के दीवाने ने जंगल जंगल घूम कर भी अपने स्वाभिमान को अमर रखा और मेवाड़ को एक नया गौरव दिया।

महाराणा प्रताप के बारें में रोचक तथ्य

1.      महाराणा प्रताप आजीवन आजाद रहे उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
2.      हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा की सेना के हरावल दश्ते का नेतृत्व हकीम खान सुर पठान के हाथ में था।
3.      महाराणा के भाले का वजन लगभग 20 किलो था और उनके भाला, कवच, तलवार आदि को मिलाकर कर कुल 208 किलो का वजन होता था।
4.      महाराणा प्रताप का वजन लगभग 110 किलों था।
5.      महाराणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था और उसके मुंह के आगे हाथी की सूंड बांधी जाती थी।

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6.      ऐसा कहा जाता है की जब चेतक दौड़ता था तब उसके पांव जमीन पर पड़ते हुए नहीं दिखते थे और हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक ने अपने दोनों पाँव मान सिंह के हाथी के सिर पर रख दी थे।
7.      maharana प्रताप का घोड़ा चेतक अपने तीन पाँव पर 26 फीट लम्बा नाला कूद गया था।
8.      महाराणा प्रताप ने तलवार के एक ही वार से बहलोल खान को उसके घोड़े सहित दो भागो में काट दिया था।
9.      हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना में 20 हजार और अकबर की सेना में 80 हजार सैनिक थे।
10.  हल्दीघाटी के युद्ध को कर्नल जेम्स टॉड ने ‘मेवाड़ की थर्मोपोली’ और दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मेराथन’ कहा था।
11. हल्दीघाटी का युद्ध मात्र 6 घण्टे ही चला था। 
12. हल्दीघाटी का युद्ध इतना भयानक था कि आज भी वहा तलवारे मिलती है।



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विरम सिंह
विरम सिंह

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1 comment:

  1. महाराणा प्रताप और उनके बहादुर घोड़े चेतक के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, बहुत अच्‍छा लगा पढ कर। आपको हार्दिक धन्‍यवाद।

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