कविता - नानेरो / ननिहाल | poem on nanihal

नमस्कार दोस्तो आज हम आपके लिए एक ऐसी कविता लेकर आए है जिससे आपको अपने बचपन के दिन याद आ जाऐगे ।

     नानेरो

नानेरा ऐडो हाव कटे ,
अटे रे जेडो लाड कटे ।
कावलिया जेडो गांव कटे ।

दाता, भुमा रो लाड अटे,
नाना, नानी रो इदकार अटे ।
जीजी, मामीसा रो चाव अटे ,
कावलिया जेडो गांव कटे ।

kavita-nanihal


चालराँय ऐड़ा और मेहरबान कटे,
खिड़िया रो दरबार अटे ।
नौकर शाही आवाम अटे ,
कावलिया जेड़ो गांव कटे ।


हवेली री शान अटे,
रतनगढ़ निर्माण अटे ।
राजभवन री तास अटे,
कावलिया जेडो ............।

आसू, चन्दु जेड़ा यार कटे,
कालू - गौरू जेड़ो साथ कटे ।
अवध बन्ना ऐड़ा ओर कटे,
कावलिया जेड़ो ................।

नानेरा मे जीण रा प्राण बचे,
'भमु' जेड़ा  भाणेज कटे ।
कावलिया जेडो गांव.......।

         प्रद्युम्न सिंह 'भम्सा'

दोस्तो कविता पढ कर आपको निश्चित ही अपने बचपन के दिन और ननिहाल की याद आ गई होगी । आप अपने ननिहाल के अनुभव और यादे कमेंट बॉक्स मे जरूर लिखे ।

यह कविता प्रद्युम्न सिंह जी द्वारा लिखी गई है जिसमे उन्होंने अपने ननिहाल की यादो का जिक्र किया है ।

महत्वपूर्ण शब्द
 नानेरा = ननिहाल
अटे = यहाँ
कटे = कहा
लाड = स्नेह


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6 टिप्पणियाँ

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August 2, 2016 at 7:37 AM ×

वाह ... आँचलिक भाषा का तड़का रचना को लाजवाब बना रहा है ... बहुत ख़ूब ...

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August 2, 2016 at 8:14 AM ×

आभार
देशी खाना और देशी भाषा का मजा कुछ ओर ही है ।

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August 2, 2016 at 2:50 PM ×

बेहतरीन रचना :)

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August 2, 2016 at 8:47 PM ×

धन्यवाद संजय जी

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August 3, 2016 at 10:54 AM ×

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 04 अगस्त 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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August 3, 2016 at 3:37 PM ×

धन्यवाद दिग्विजय जी

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