गुरु की शिष्य को सीख

   
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बात उस Time की है जब school नही हुआ करते थे और विद्या अध्ययन के लिए आश्रम होते है ।study के लिए सभी को आश्रम मे रहना पड़ता था ।
उस समय साधु महात्मा ही सभी को शिक्षा देते थे ।
विद्या प्राप्ति के बाद जब किसी students की शिक्षा पुरी हो जाती थी तो गुरु उसको एक अन्तिम शिक्षा देता था जो उसके जीवन से जुड़ी होती थी ।

ऐसे आश्रम मे पढ़ाई करने वाले एक युवक की शिक्षा पुरी हुई तो गुरू ने उसे सीख देने के लिए अपने पास बुलाया ।
गुरु अपना मुँह खोलते है और शिष्य को मुँह मे देखने का कहते है । शिष्य को बड़ा आश्चर्य हुआ कि गुरु ऐसा क्यो कह रहे है परंतु गुरु की आज्ञा को मानकर उनके मुंह मे देखता है  ।

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गुरु शिष्य से सवाल पूछते है कि मेरे मुंह मेरे तुम्हे क्या क्या दिखाई दिया ।
शिष्य कहता है " गुरूजी आपके मुँह मे तो केवल जुबान ही है दाँत तो बिल्कुल भी नही है । "

गुरूजी ने मुस्कराते हुए कहा कि " जब मेरा जन्म हुआ तब भी जुबान मेरे मुँह मे थी और दाँत 2 साल बाद मे आए थे । लेकिन तो भी दाँत पहले साथ छोड गए ।"

शिष्य ने कहा यह बात तो सही है । लेकिन ऐसा क्यो ?

गुरु ने कहा -"  वत्स दाँत कठोर थे और जुबान मुलायम ।  दाँत अपनी कठोरता के कारण जल्दी टूट गए और जुबान अपनी मुलायमता के कारण अभी तक मेरे साथ है ।

"जी गुरूजी "शिष्य ने कहा।

गुरु ने कहा " वत्स इससे यह शिक्षा मिलती है की हम जितने कठोर रहेगे उतने जल्दी तोड दिए जाओगे और जितने नम्र रहोगे इतना ज्यादा आगे तक जाओगे ।"

शिष्य ने गुरूजी की बात को अपने मन मे उतार कर वह अपने घर की ओर रवाना हो गया ।

शिक्षा - इससे हमे यह सीखना चाहिए कि हमे अपनी life मे कठोर नही होना चाहिए । बल्कि सबके साथ नम्रता से बात करनी चाहिए । कठोरता से दोस्त की जगह दुश्मन ज्यादा बनते है ।







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