युवा देखे है

       

            कविता


कविता युवा देखे है



नीली नीली आँखो से तीर निकलते देखे है
घायल पंछी की भांति तड़पते आशिक देखे है ।।

कोयल जैसी आवाज उसकी , रसगुल्ले जैसे होठ है ।
इन होठो पर मरते युवा देखे  है   ।।

बादाम जैसी आँखे उसकी , हिरणी सी चाल है ।
आँखो से आँखे लड़ाते नौजवान देखे है ।।

वो भाव देती नहीं , ( फिर भी) चींटी की तरह चिपकते है।
भारत माता पुकार रही , अनजान बनते युवा देखे है ।।

जिसने नौ माह पेट मे रखा , दि जमाने की हर खुशी।
उस माँ को "तेरी क्या औकात " कहते बेटे देखे है ।।

गाय माता दुख मे पुकार रही है ।
इश्क मे घायल युवाओ को अनजान बनते देखे है ।।

घायल पंछी की भांति तड़पते आशिक देखे है .....

♤♤♤♡♤♡♢♧♡■♡♢♤♢♧♢♡♢☆♢

                 विरम सिंह सुरावा



विरम सिंह
विरम सिंह

This is a short biography of the post author. Maecenas nec odio et ante tincidunt tempus donec vitae sapien ut libero venenatis faucibus nullam quis ante maecenas nec odio et ante tincidunt tempus donec.

No comments:

Post a Comment