ओशो का अनमोल विचार


      जब कोई तामीर बेतखरीब हो सकती नहीं ।
      खुद मुझे अपने लिए बरबाद होना चाहिए ।।

इस जगत में बिना मिटाए कुछ भी नहीं बनता । जब कोई तामीर बेतखरीब हो सकती नहीं , जब कोई चीज बन ही नहीं सकती बिना मिटाये, बिना विध्वंस के सृजन होता ही नहीं तो खुद मुझे अपने लिए बरबाद होना चाहिए ।मिटना होगा यदि स्वयं को पाना है । जलना होगा तुम्हे अगर ज्योतिर्मय हो जाना है । बीज मिटता है तो वृक्ष होता है , नदी मिटती है तो सागर हो जाती है । जिस घडी तुम मिटने को राजी हो गये , उसी घडी तुम्हारे भीतर परम का आविर्भाव हो जाता है। वह फिर कभी नहीं मिटता ।
तुम तो क्षणभंगुर हो , पानी के बुलबुले हो , बचे भी तो कितनी देर बचोगे ? मौत तो आ ही जाएगी, तो फिर अपने हाथ से छलांग क्यों नहीं लगा लेते । जो स्वयम मर जाता है वाही ध्यान को उपलब्ध होता है । समाधि आत्म मरण है । मरने से कोई शारीरिक मरने की बात नहीं है । शरीर तो बार बार मरा है , और फिर फिर तुम वापिस अगये । इस बार अहंकार को मरने दो कि फिर वापिस आना नहीं होगा । फिर तुम सुगत हो जाओगे, अर्थात जो ठीक ठीक चला जाता गया, फिर वापिस नहीं आता ।
                              ओशो


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विरम सिंह
विरम सिंह

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